
मेरा परिचय _Navin Kishor Mahto Bikki____________________
मेरा नाम नवीन किशोर महतो है, मेरा जन्म 10 /12/1997 में झारखंड के राँची शहर के एक छोटे से गाँव बाँकु में हुआ lमैंने अपना माध्यमिक शिक्षा सरस्वती विद्या मंदिर 2012 में पूरा किया l उसके बाद I. SC संत जेवियर इंटर कॉलेज से और डिप्लोमा ईन मेकेनिकल इंजीनियरिंग जेवियर इंस्टीयूट ऑफ पालीटेक्निक एंड टेक्नोलॉजी (राँची) से किया !इसके साथ साथ मैंने अपने साहित्यिक क्षेत्रः में विभिन्न पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं |जिसमें दो साझा कविता पुस्तक संग्रह – सृजन अभिलाष और काव्य कुसुम है lभोपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका अभ्युदय और मुंबई से प्रकाशित पत्रिका साहित्यनामा में मेरी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी है lफ़िलहाल मेरी साहित्यिक यात्रा जारी है l
मेरी दस कविताएँ ___________________
1) अधूरापन ___________
अधूरापन मेरे साथ साथ चला ! जैसे मेरा साया हो !!
बल्ब से चमकते लोगों के ! रोशन भीड़ में !!
उनकी योग्यताएं मेरी दीवारें थी ! मानो मैं अलग ग्रह का वासी हूँ !
मेरा शरीर पहाड़ सा खुरदरा था !
जिसने मौसम के कई मार सहा !
चटकते धूप में,
मूसलाधार बारिश में,
इसलिए मैं हमेशा अलग रहा !
भीड़ से अलग ! अपनी परछाई के साथ !
„अकेला „अधूरेपन के साथ !एक खुले आसमान में !
2) ईश्वर का खोज ___________________
सदियों पूर्व मरे होंगेभूख से कई मानव !!
अब कंकाल पत्थर बन मौन हैं !!
आधुनिक मानव पूजते देवता मानकर !
क्यों नहीं मानते ?
भूख के सूक्ष्म जीवाणुओं ने उनके शरीर को गलाया है !
फिर जिंदा भटक रहे हैं, देवता ! खोजते मिलेंगे खाना !
कचरे के ढेरों पर !!
सोते मिलेंगे !!
फुटपाथों पर !!
मंदिर के बाहर !!
देवता का अंतिम रूप लेते हुए !
3) चावल का विज्ञान _________________
एक किसान का बेटा !
नहीं बनना चाहता !
एक अच्छा किसान !वो देखना चाहता है !
आसमान से उसके छोटे छोटे खेतचीटियों से दिखते खेत में काम करते मजदूर किसान !
वो समझना चाहता है !
चावल का चुंबकीय गुण धर्म !
कैसे चावल कम दामों में चुंबक की तरह खिंच लेती है
महानगर !! किसान भूखा रह जाता है !
वो चुनौती देना चाहता है !
न्युटन के बनाये सभी नियमों को वो बताना चाहता है !
चावल के विज्ञान में न्यूटन का नियम अधूरा है !!
4) स्मृतियाँ
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स्मृतियों में एक पुरानी साईकिल है !
जहाँ से पिताजी के बाल,काले दिख रहे हैं !
मैं एक छोटा सा बालक हूँ !
नदी के उस पार मेला लगा है जहाँ बहुत भीड़ है !
उस भीड़ में पिताजी का अंगूठा थाम चल रहा हूँ !
भीड़ कम नहीं हुआ,
समय के साथलेकिन पिताजी का अंगूठा पीछे छुठ गया !
मैं आगे बढ़ गया !!
एक नयी भीड़ मेंएक नया अंगूठे के साथस्मृतियों में एक दिन !!
5.) पिताजी कहते थे _________________________
बचपन में पिताजी कहा करते थे !
शहर में रोज मेला लगता है !
और मैं पूछ उठता ?
पुस् मेला से भी,
बड़ा हाँ, उसके अंदर कई,
पुस् मेला समा सकता है !
वहाँ रंग बिरंगे,
बैलून कई झूले लगे होते हैं ! कई प्रकार के व्यंजन
बहुत भीड़ होता है !लेकिन सड़कों पर प्लास्टिक के गाड़ी नहीं बिकते !
जिसे हाथों से तुम ठेल सको !
वहाँ लोग रोज नयी नयी पोशाक पहनते मैं
अक्सर कह उठता मैं भी शहर जाऊँगा !कई वर्ष बीत गए !
अब मैं शहर में हुँ !
पिताजी गाँव में !!
वो सच ही कहते थे !!
मेले में खोए, लोग मिल जाते हैं !!
शहर में खोए, लोग नहीं मिलते !!
मैं शहर में खो गया !!
एक घर में सिमट कर !!
गाँव मेरा इंतजार करता रहा !!
पुस – पाँच परगना क्षेत्रः का एक ऐतिहासिक ग्रामीण पर्व जो मकर संक्रांति में मनाया जाता है l
6) ललकार _____________________
जंगली जानवर गाँव आ रहे हैं !!
कल सुना मैंनेखुंखार भेड़िये आँगन में गुर्रा रहे थे !!
वर्षों पहले खिंची सीमा की लकीर तोड़ जंगली जानवर गाँव आ रहे हैं !!
झरना सुखी पड़ी थी !!
जहाँ बाघ और हिरन एक घाट में पानी पिया करते थे !!
कल देखा मैंने मुर्दा बन लटके चमगादड़ पेड़ों पर !!
आगे बढ़ा सुन ठक ठक की
आवाज सोचा कठफड़वे का दर्शन करता चलूँ !
देख रह गया स्तब्ध !!
कठफड़वे के शक़्ल में इंसान थे !!
आगे बढ़ा घने जंगल की ओर कुछ आवाजें भयभीत कर रहीं थीं !!
खरगोश बैठे थे मौन व्रत लिए सियार सभा को संबोधित कर रहे थे !!
जंगल का राजा सिंह नहीं था शायद चिड़ियाघर में कैद हो !!
हाथी सिंहासन पर बैठ चिंघाड़ रहे थे !!
शंख की ध्वनि बजती हो,
जैसे रण में भागा-भागा आया गाँव !! सुनाई मैंने कथा वृतांत !!
लोग मेरी बातें सुन हँस रहे थे !!
7 ) पहाड़ी गीत _____________________________
ऊँची चोटी पर बैठा पहाड़ी गीत गाता है !!.
जब बर्फ पेड़ों पर सिमटता है
सर्द हवाएँ रोंगटे खड़ी करती है नदी की धाराएँ जब जम जाती है !!
ऊँची चोटी पर बैठा पहाड़ी गीत गाता है !!
छोटे कद का पहाड़ी भेड़ों को सुनाता है,
अपना गीततुम पत्थर चरना भी सीख लोहरी हरी घास हमेशा नहीं रहेंगी !!
खोज लो पहाड़ पर शिलाजीतबंदरों के जैसे !!
ताकि भुख निगल न जाए जो ठंड से बचाते आया है
अफसोस भुख भी बचा पाता मैं सुना रहा हुँ !!
आखिरी गीत इस पहाड़ पर फिर हरी घास उगे न उगे !!
भुख का ग्रहण गहरा रहा है जाने किस दिन पहाड़ ग्रास कर जाए फिर तुम रहोगे न मैं रहूँगा !!
बचा रहेगा ये पथरीली सड़क जो कभी पहाड़ हुआ करता था !!
मेरे पहाड़ी गीत जो तुम्हारे ऊनी बालों के साथ
उड़ता रहेगा सर्द हवाओं में तब मुझे दोष मत देना
इससे पहले कुछ बताया नहीं शायद सुनने और सुनाने के लिए मैं भी न रहूँ !! तुम भी न रहो !!
ऊँची चोटी पर बैठा पहाड़ी गीत गाता है !!
9) गुल्लक ______________________
छोटा था तो क्या हुआसारे सपने कैद थे !!
मिट्टी के गुल्लक में चावानी आठानी के पैसों में वो बच्चा रोज गिनता था !!
उसके भरने के दिन को कान से सटाकर सुनता था !!
क्षण छन की आवाज उसके सारे सपने थिरकने लगते थे !!
गुल्लक के छोटे दरवाजे से निकलता था दुध, गुड़िया
और कपड़े उसकी सोयी बहन के लिए !!
जिसे पानी पीला कर अक्सर सुला देता था माँ के काम में जाने के बाद !!
फिर निकालता था छोटे दरवाजे से चावल, दाल और रोटियाँ अपने माता पिता के लिए !!
अपने लिए एक कुदाल एक अनजान शहरवो बच्चा रोज गिनता था !!
उसके भरने के दिन !
10) राजनीतिक आग ___________________________
तुम गलत हो !!
वहाँ आग लगाओ जहाँ लोग कच्चे खा रहे !!
अधपका चावल, धुप में सेंक रहे रोटी !!
पी रहे अपने शरीर का खारा पानी !
मुझे पता है खारे पानी से प्यास नहीं मिटती !!
लेकिन धरती का आधा पानी खारा है !! जिसे गरीब,
बेबस, असहाय लोग पीते हैं !!
जिनके पेट पर भौका जाता हज़ारों छुरियाँ
लेकिन ज़िन्दा हैं सदियों से रहेंगे सदियों तक !!
तुम्हारी आग में कितनी ताप है ??
क्या रोटी पक सकता है ? अगर हाँ है !!
तो लगा दो आग सफेद बर्फ से ढंके लोगों
पर जो हिमालय की तरह विशाल होते जा रहे हैं !!
हे भागीरथ,
ढहा दो बर्फ में छिपे कीड़ों को तुम्हारी ताप से बिलबिलाते मरे
बहा दो एक नयी गंगा !!
लगा दो एक प्रचंड आग !!
©® नवीन किशोर महतो
राँची ( झारखंड )
भारत

